राजस्थान से ओडिशा पहुंचे पत्रकार दल ने आज भुवनेश्वर स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद–खनिज एवं पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-IMMT) का दौरा किया। पत्रकार दल ने संस्थान में चल रहे विभिन्न अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास कार्यों का अवलोकन किया तथा अनुसंधान को औद्योगिक उपयोग तक पहुंचाने की प्रक्रिया को समझा।

CSIR-IMMT खनन, खनिज एवं धातु उद्योगों से संबंधित अनुसंधान एवं विकास चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ खनिज संसाधनों के सतत उपयोग, मूल्य संवर्धन और उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के विकास पर कार्य कर रहा है।

इस अवसर पर CSIR-IMMT के निदेशक प्रोफेसर रामानुज नारायण ने पत्रकार दल को संस्थान में चल रहे विभिन्न अनुसंधान कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान में खनिज प्रसंस्करण, महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) तथा औद्योगिक एवं अन्य अपशिष्टों से उपयोगी एवं मूल्यवान सामग्रियों की रिकवरी पर विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि संस्थान की मौजूदा अनुसंधान परियोजनाओं में कोयला अवशेष (Coal Rejects), फ्लाई ऐश, रेड मड और अन्य द्वितीयक संसाधनों (Secondary Resources) से दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements–REEs) तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी शामिल है। इसके अलावा कोबाल्ट, निकेल, टाइटेनियम, वैनेडियम, लिथियम, मैंगनीज और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी एवं प्रसंस्करण से संबंधित प्रौद्योगिकियों पर भी अनुसंधान किया जा रहा है।

प्रोफेसर रामानुज ने बताया कि संस्थान में अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने की दिशा में भी अनुसंधान किया जा रहा है। इस क्रम में विकसित प्रायोगिक संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 50 किलोग्राम फ्लाई ऐश के प्रसंस्करण की है। संयुक्त रूप से विकसित और पेटेंट प्रक्रिया के माध्यम से फ्लाई ऐश से एलुमिना, कैल्शियम सिलिकेट, क्वार्ट्ज अवशेष तथा दुर्लभ मृदा तत्वों से समृद्ध आयरन हाइड्रॉक्साइड अवशेष जैसे उत्पादों की रिकवरी की दिशा में कार्य किया जा रहा है। यह प्रक्रिया औद्योगिक अपशिष्ट में मौजूद उपयोगी घटकों को अलग कर उनका मूल्य संवर्धन करने तथा ‘वेस्ट टू वैल्यू’ की अवधारणा को बढ़ावा देने की संभावनाओं को दर्शाती है।

उन्होंने बताया कि महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए CSIR-IMMT में प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार के संसाधनों से दुर्लभ मृदा तत्वों की रिकवरी पर अनुसंधान किया जा रहा है। संस्थान की विभिन्न परियोजनाओं में क्षारीय चट्टानों जैसे प्राथमिक स्रोतों के साथ-साथ कोयला अवशेष, फ्लाई ऐश और रेड मड जैसे द्वितीयक स्रोतों से REEs की रिकवरी पर कार्य शामिल है। इसी प्रकार, ऑयल इंडिया के साथ भी महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास के लिए सहयोग किया जा रहा है। इन पहलों का उद्देश्य प्रयोगशाला स्तर पर विकसित प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर उपयोग और औद्योगिक अनुप्रयोग की दिशा में आगे बढ़ाना है।

डॉ. रामानुज नारायण ने कहा कि भारत के लो-ग्रेड मिनरल्स, सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक कचरे में बड़ी आर्थिक संभावनाएं छिपी हैं। संस्थान सोलर स्क्रैप से क्रिटिकल मिनरल्स निकालने की तकनीक पर काम कर रहा है। उनका मानना है कि वैज्ञानिकों, उद्योग और युवाओं की साझेदारी से 2040 तक कचरे को संसाधन में बदलने वाला मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया जा सकता है।

श्री नारायण ने बताया कि राजस्थान में सौर ऊर्जा के विस्तार को देखते हुए CSIR सोलर पैनलों की रीसाइक्लिंग से महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी के लिए तकनीक विकसित कर रहा है। राजस्थान और गुजरात में बड़े सौर ऊर्जा ग्रिड को देखते हुए सोलर पैनल में मौजूद ग्लास, सिलिकॉन और अन्य घटकों को पुनर्प्राप्त करने पर काम किया जा रहा है।इसके लिए आगामी वर्षों में पायलट प्लांट और उन्नत हाइड्रोमेटलर्जी तकनीकों के माध्यम से महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी को आगे बढ़ाया जाएगा।

ओडिशा खनिज संसाधनों की दृष्टि से देश के प्रमुख राज्यों में शामिल है। ऐसे में खनन के साथ-साथ खनिज प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास महत्वपूर्ण है। CSIR-IMMT में चल रहे अनुसंधान कार्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उद्योग के बीच सहयोग के माध्यम से खनिज संसाधनों के अधिकतम एवं सतत उपयोग की संभावनाओं को रेखांकित करते हैं।

दौरे के दौरान पत्रकार दल ने संस्थान की विभिन्न अनुसंधान एवं प्रायोगिक सुविधाओं का अवलोकन किया और वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों से अनुसंधान प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी विकास तथा उसके औद्योगिक उपयोग से जुड़े विषयों पर संवाद किया।

पत्रकार दल ने ऐतिहासिक उदयगिरि एवं खंडगिरि गुफाओं का भी दौरा किया। इस दौरान पत्रकार दल ने इन प्राचीन शैलोत्कीर्णित गुफाओं की स्थापत्य एवं ऐतिहासिक विरासत का अवलोकन किया।जैन परंपरा से संबंधित इन गुफाओं का निर्माण खारवेल और उनके उत्तराधिकारियों के काल में कराया गया था। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं में रानीगुम्फा एवं स्वर्णपुरी-मंचपुरी जैसी दो मंजिली गुफाएं उल्लेखनीय हैं।

हाथीगुम्फा में प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व की ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण खारवेल का अभिलेख उनके शासनकाल के महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण प्रस्तुत करता है। बारहभुजी गुफा में उत्कीर्ण 24 तीर्थंकरों एवं उनकी शासन देवियों तथा अनंतगुफा में गजलक्ष्मी, सूर्य और स्वास्तिक के अंकन प्राचीन भारतीय शिल्प एवं कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

दौरे के दौरान पत्रकार दल ने संस्थान की विभिन्न अनुसंधान एवं प्रायोगिक सुविधाओं का अवलोकन किया और वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों से अनुसंधान प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी विकास तथा उसके औद्योगिक उपयोग से जुड़े विषयों पर संवाद किया। साथ ही, उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं के माध्यम से ओडिशा की समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को भी जाना।