मछली पालन की तस्वीर में जाल साफ दिखता है, पानी की जाँच कम। जबलपुर में 18 फरवरी 2025 के एक कार्यक्रम ने दोनों को साथ रखा। कॉलेज ऑफ फिशरी साइंस में अनुसूचित जनजाति समुदाय के 126 मत्स्यपालक और उद्यमी जुटे। आयोजन आईसीएआर–राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो और नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जनजाति योजना के तहत किया।

तालाब के चार अलग सवाल

तकनीकी सत्रों में मत्स्य उद्यमिता, रोग प्रबंधन, पानी की गुणवत्ता और मछली से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने पर बात हुई। केंद्रीय मत्स्य संस्थानों, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय और मध्य प्रदेश मत्स्य विभाग के विशेषज्ञ इसमें शामिल थे। तालाब में मछली का स्वास्थ्य और पकड़ के बाद उसका उपयोग—दोनों हिस्से एक ही पाठ्यक्रम में रखे गए।

बीज, जाल और जाँच-किट

प्रतिभागियों को गुणवत्तापूर्ण मछली बीज, फेंककर फैलाया जाने वाला कास्ट नेट और पानी की जाँच-किट दी गई। बीज से पालन शुरू होता है; जाल मछली संभालने का औजार है और किट उस पानी को परखने का साधन जिसमें मछली बढ़ती है। कार्यक्रम का समन्वय कॉलेज की डॉ. माधुरी शर्मा तथा ब्यूरो के डॉ. राजीव के. सिंह और डॉ. अनुतोष पारिया ने किया।

यह फरवरी 2025 के प्रशिक्षण और सौंपे गए साधनों का रिकॉर्ड है। बाद में कितने तालाबों में किट इस्तेमाल हुई या उत्पादन कितना बदला, इसका आकलन इस विवरण में नहीं है।

मुख्य बातें

  • 18 फरवरी 2025 को जबलपुर के कॉलेज ऑफ फिशरी साइंस में अनुसूचित जनजाति समुदाय के 126 मत्स्यपालक और उद्यमी शामिल हुए।
  • सत्रों में उद्यमिता, मछली रोग प्रबंधन, पानी की गुणवत्ता और मूल्यवर्धित उत्पाद शामिल थे।
  • प्रतिभागियों को मछली बीज, कास्ट नेट और पानी की जांच-किट दी गई; स्रोत बाद की उपज या आय नहीं बताता।

स्रोत और संदर्भ

  1. Indian Council of Agricultural Research / ICAR-NBFGR · ICAR-NBFGR Fosters Growth in Tribal Fish Farming with STC Capacity Building Programmes ↗18 फ़रवरी 2025

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 16 सितंबर 2026।

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